शनिवार, 24 जून 2017

२६५.ज़रूरी

इश्क में थोड़ा झुकना भी ज़रूरी है,
लम्बा चलना है, तो रुकना भी ज़रूरी है.

यह सोच कर तमाचा सह लिया मैंने,
कुछ पाना है अगर, तो खोना भी ज़रूरी है.

आवाज़ दूँ कभी, तो देख लेना मुड़ के,
जीना है अगर, तो उम्मीद भी ज़रूरी है.

पत्थर जो फेंको, तो ज़रा ज़ोर से फेंको,
कोशिश जो की है, तो नतीज़ा भी ज़रूरी है.

कोई डर है जो दिल में, दिल ही में रखो,
चेहरे से हौसला झलकना ज़रूरी है.

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-06-2016) को "हिन्दी के ठेकेदारों की हिन्दी" (चर्चा अंक-2649) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत खूब , बढ़िया रचना मंगलकामनाएं !

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