शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

२८९. राक्षस

कभी अपने अन्दर का 
राक्षस देखना हो,
तो उग्र भीड़ में 
शामिल हो जाना.

जब भीड़ से निकलो,
तो सोचना 
कि जिसने पत्थर फेंके थे,
आगजनी की थी,
तोड़-फोड़ की थी,
बेगुनाहों पर जुल्म किया था,
जिसमें न प्यार था, न ममता,
न इंसानियत थी, न करुणा,
जो बिना वज़ह 
पागलों-सी हरकतें कर रहा था,
वह कौन था?

उसे जान लो,
अच्छी तरह पहचान लो,
देखो, तुम्हें पता ही नहीं था 
कि वह तुम्हारे अन्दर ही 
कहीं छिपा बैठा है.

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

२८८. स्टेशन

मैं चुपचाप जा रहा था ट्रेन से,
न जाने तुम कहाँ से चढ़ी 
मेरे ही डिब्बे में
और आकर बैठ गई 
मेरे ही बराबरवाली सीट पर.

धीरे-धीरे बातें शुरू हुईं 
और बातों ही बातों में 
हमने तय कर लिया 
कि हम एक ही स्टेशन पर उतरेंगें,
वह स्टेशन कोई भी क्यों न हो.

पर छोटे-से सफ़र में 
न जाने क्या गड़बड़ हुई, 
तुमने कह दिया
कि ऐसे किसी भी स्टेशन पर 
तुम उतर जाओगी,
जहाँ मैं नहीं उतरूंगा.

मैंने भी सोच लिया है 
कि ऐसे किसी भी स्टेशन पर 
मैं उतर जाऊंगा,
जहाँ तुम उतरोगी.

क्या कोई ऐसा भी स्टेशन है,
जहाँ से ट्रेन 
न आगे जाती हो,
न पीछे लौटती हो?

अगर है, तो आओ हम दोनों 
उसी स्टेशन पर उतर जाएं.

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

२८७. आखिरी खनक

अभी-अभी सुनी है मैंने 
तुम्हारे गेहुएं पांवों में बंधी 
पायल की आखिरी खनक.

काश कि मैं जवान होता,
कान थोड़े ठीक होते,
तो कुछ देर तक सुन पाता
तुम्हारी पायल की खनक.

मैंने महसूस किया है फ़र्क 
तुम्हारे आनेवाले पांवों और 
लौटनेवाले पांवों में बंधी 
पायल की खनक में.

लौटनेवाले पांवों में बंधी 
पायल की खनक ऐसी,
जैसे कोई बीमार 
अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा 
अंतिम सांसें ले रहा हो.

न जाने कब टूट जाय 
उसकी धीमी पड़ती सांस,
न जाने कब सुन जाय 
पायल की आखिरी खनक.

शनिवार, 25 नवंबर 2017

२८६. कविता

मैंने छोड़ दिया है अब 
कविता लिखना.

कविता लिखने का सामान -
काग़ज़, कलम,दवात -
दूर कर दिया है मैंने,
यहाँ तक कि कुर्सी-मेज़ भी 
हटा दी है अपने कमरे से.

मन में भावनाओं का 
ज्वार उमड़ रहा हो,
शब्द अपने-आप 
लयबद्ध होकर आ रहे हों,
तो भी नहीं लिखता मैं 
कोई कविता.

मैंने तय कर लिया है 
कि मैं तब तक नहीं लिखूंगा 
कोई नई कविता,
जब तक कि उसमें लौट न आए  
कोई आम आदमी.

रविवार, 19 नवंबर 2017

२८५.परिवर्तन


पत्तों से भरा सेमल का पेड़
ख़ुश था बहुत,
हवाएं उसे दुलरातीं,
पथिक सुस्ता लेते 
उसकी घनी छाया में,
फुदकते रहते पंछी 
उसकी हरी-भरी टहनियों में.

एक दिन पत्तियां गुम हुईं,
फूलों से लद गया सेमल,
जो भी देखता उसे,
बस देखता ही रह जाता,
फूला न समाता 
आत्म-मुग्ध सेमल.

पर ये दिन भी निकल गए,
अब न फूल हैं, न पत्ते,
न पक्षी हैं, न पथिक,
आज सेमल अकेला है,
बहुत उदास है सेमल.

इस बार जब पत्ते आएंगे,
सेमल उन्हें बाँहों में जकड़ लेगा,
गिरने नहीं देगा उन्हें,
सूखने नहीं देगा उनका रस.

इस बार जब फूल आएंगे,
सेमल ध्यान रखेगा उनका,
बिछड़ने नहीं देगा उन्हें,
बचाएगा उन्हें बुरी नज़र से.

इस बार जब फुदकेंगे पंछी,
सेमल उन्हें उड़ने नहीं देगा,
ओझल नहीं होने देगा उन्हें,
चौकसी करेगा उनकी.

सेमल नहीं जानता
कि ऐसा हो नहीं सकता,
ऐसा होना भी नहीं चाहिए,
सेमल नहीं जानता 
कि परिवर्तन ही नियम है,
परिवर्तन ही अच्छा है.