शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

२८५. परिवर्तन


पत्तों से भरा सेमल का पेड़
ख़ुश था बहुत,
हवाएं उसे दुलरातीं,
पथिक सुस्ता लेते 
उसकी घनी छाया में,
फुदकते रहते पंछी 
उसकी हरी-भरी टहनियों में.
एक दिन पत्तियां गुम हुईं,
फूलों से लद गया सेमल,
जो भी देखता उसे,
बस देखता ही रह जाता,
फूला न समाता 
आत्म-मुग्ध सेमल.
पर ये दिन भी निकल गए,
अब न फूल हैं, न पत्ते,
न पक्षी हैं, न पथिक,
आज सेमल अकेला है,
बहुत उदास है सेमल.
इस बार जब पत्ते आएंगे,
सेमल उन्हें बाँहों में जकड़ लेगा,
गिरने नहीं देगा उन्हें,
सूखने नहीं देगा उनका रस.
इस बार जब फूल आएंगे,
सेमल ध्यान रखेगा उनका,
बिछड़ने नहीं देगा उन्हें,
बचाएगा उन्हें बुरी नज़र से.
इस बार जब फुदकेंगे पंछी,
सेमल उन्हें उड़ने नहीं देगा,
ओझल नहीं होने देगा उन्हें,
चौकसी करेगा उनकी.
सेमल नहीं जानता
कि ऐसा हो नहीं सकता,
ऐसा होना भी नहीं चाहिए,
सेमल नहीं जानता 
कि परिवर्तन ही नियम है,
परिवर्तन ही अच्छा है.


रविवार, 5 नवंबर 2017

२८४. आख़िरी कदम

बहुत दूर से,
बहुत देर से,
बहुत तकलीफ़ सहकर 
तुम आख़िर पहुँच ही गई 
मेरे दरवाज़े तक.

मैंने भी लगभग 
खुला छोड़ रखा था दरवाज़ा,
तुम दस्तक देती,
तो खुल जाता अपने आप,
पर दरवाज़े तक आकर
तुम वापस लौट गई,
मैंने भी आहट सुन ली थी 
तुम्हारे आने की,
पर दस्तक के इंतज़ार में रहा.

हम जब एक लम्बा सफ़र 
तय कर लेते हैं,
तो एक आख़िरी कदम बढ़ाना 
इतना मुश्किल क्यों हो जाता है,
या फिर आख़िरी कदम
वही क्यों नहीं बढ़ा लेता,
जिसने कोई सफ़र किया ही न हो.

शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

२८३.रफ़्तार


धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ रही है गाड़ी,
छूट गया पीछे स्टेशन,
ओझल हो गए परिजन,
जाने-पहचाने मकान,
गली-कूचे, सड़कें,
पेड़,चबूतरे- सब कुछ.

पीछे रह गया मेरा शहर,
धीरे-धीरे छूट जाएगा 
मेरा ज़िला, मेरा सूबा,
पीछे रह जाएगी यह हवा,
इसकी ताज़गी,
यह मिट्टी, इसकी ख़ुशबू.

रफ़्तार के नशे में हूँ मैं,
आँखें मुंदी हैं मेरी,
एक नई मंज़िल के सपने का 
ख़ुमार है मुझ पर.

नई मंज़िल न जाने कैसी होगी,
न जाने होगी भी या नहीं,
पर जो था, जो है,
सब छूटता जा रहा है.

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

२८२. दिया और हवाएं


इस बार की दिवाली कुछ अलग थी,
बस थोड़े से चिराग़ जल रहे थे,
अचानक तेज़ हवाएं चलीं,
एक-एक कर बुझ गए दिए सारे,
पर एक दिया जलता रहा,
लड़ता रहा तब तक,
जब तक थक-हारकर 
चुप नहीं बैठ गईं हवाएं.

उस एक चिराग़ ने प्रज्वलित किए
वे सारे दिए, जो बुझ गए थे 
और बहुत से ऐसे दिए भी, 
जिन्हें जलाया नहीं गया था.

अब सैकड़ों-हज़ारों दिए जल रहे हैं
आत्म-विश्वास से भरपूर,
सिर उठाए खड़ी है उनकी लौ
और किसी कोने में सहमी सी बैठी हैं 
तेज़ हवाएं.

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

२८१. दहशत में जीभ

आजकल गुमसुम रहती है मेरी जीभ ,
बोलती नहीं कुछ भी,
बस चुपचाप पड़ी रहती है मुंह में.

खो गया है उसका अल्हड़पन,
फूल नहीं झरते अब उससे,
मेरी जीभ नहीं करती अब 
रोतों को हंसा देने वाली बातें,
अब नहीं करती वह 
पहले सी ज़िद,
नहीं कहती कहीं भी जाने को,
नहीं कहती कुछ भी खाने को,
सारे स्वाद भूल गई है मेरी जीभ.

अब बच्ची नहीं रही मेरी जीभ ,
अचानक से बड़ी हो गई है,
आजकल मेरी जीभ 
मेरे ही दांतों की दहशत में है.