शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

२९८. अनकहा

कभी कुछ कहना चाहो,
तो कह देना,
मैं बुरा नहीं मानूंगा,
अच्छा ही लगेगा मुझे.

कहाँ छुप पाता है कुछ अनकहा,
जो कोई कहना चाहता हो,
शब्दों में न सही,
आँखों में तो झलक ही जाता है.

आधा अधूरा व्यक्त हो,
अटकलों को जन्म दे,
ग़लतफ़हमियाँ फैलाए,
इससे तो अच्छा है 
कि फूटकर बह निकले 
मवाद की तरह,
किसी एक को तो चैन मिले.

शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

२९७.अलाव

आओ, अलाव जलाएँ,
सब बैठ जाएँ साथ-साथ,
बतियाएँ थोड़ी देर,
बांटें सुख-दुख,
साझा करें सपने,
जिनके पूरे होने की उम्मीद 
अभी बाक़ी है.

हिन्दू, मुसलमान,
सिख, ईसाई,
अमीर-गरीब,
छोटे-बड़े,
सब बैठ जाएँ 
एक ही तरह से,
एक ही ज़मीन पर,
खोल दें अपनी 
कसी हुई मुट्ठियाँ,
ताप लें अलाव.

घेरा बनाकर तो देखें,
नहीं ठहर पाएगी 
इस अलाव के आस-पास 
कड़ाके की ठंड.

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

२९६.अँधेरे में

ऐसा क्यों होता है 
कि कुछ लोगों को हमेशा 
अँधेरे में रहना पड़ता है 
और कुछ के जीवन से 
उजाला दूर ही नहीं होता?

क्या ऐसा संभव नहीं 
कि सब हमेशा उजाले में रहें?
अगर नहीं, तो कम-से-कम इतना हो जाय 
कि हरेक के हिस्से में 
समान अँधेरा और उजाला हो.

अगर यह भी संभव नहीं,
तो आओ, ख़ुदा से कहें 
कि अपना उजाला वापस ले ले 
और सब को एक साथ,एक तरह से 
अँधेरे में ही रहने दे.

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

२९५. तुम्हारे ख़त


तुम्हारे प्रेमपत्र सहेज के रखे हैं मैंने,
सालों से उन्हीं को पढता हूँ बार-बार,
अपनी लिखावट में दिखाई पड़ती हो तुम,
लगता है जैसे तुमसे मुलाकात हो गई.

अब पीले पड़ गए हैं ये काग़ज़,
उजड़-सी गई है सियाही इनकी,
पर किसी भी तरह बचाना है इन्हें,
ज़िन्दा रखना है इन ख़तों को उम्रभर.

पत्र तो अब भी आते हैं तुम्हारे,
पर मेल से, क़रीने से छपे अक्षरों में,
जिनमें तुम्हारी वह झलक नहीं मिलती,
जो तुम्हारी बेतरतीब लिखावट में है.

शनिवार, 20 जनवरी 2018

२९४. जीवन और मृत्यु

नई जगह,
नई डगर,
चारो ओर छाया है 
घनघोर अँधेरा,
कहीं कोई किरण नहीं,
न ही किरण की उम्मीद,
कहीं कोई आवाज़ नहीं,
परिंदे भी चुप हैं.

अब आगे जाऊं या पीछे,
दाएं जाऊं या बाएँ,
ख़तरा किधर है, पता नहीं,
मंजिल किस ओर है, क्या मालूम.

तो क्या मैं रुक जाऊं?
बैठ जाऊं?
इंतज़ार करूँ अनंत तक रौशनी का?
नहीं, यह संभव नहीं,
भले कुछ भी हो जाय,
भले मैं लड़खड़ा जाऊं,
गिर जाऊं, मर जाऊं,
मुझे चलना ही है,
चलना ही जीवन है
और रुकना मृत्यु.