शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

२९३. सर्द सुबह से दो-दो हाथ


बड़ी सर्द सुबह है आज,
न जाने कहाँ है सूरज,
कोई उम्मीद भी नहीं
कि वह उगेगा,
लगता है, छिप गया है कहीं,
डर गया है सूरज 
इस सर्द सुबह से.

बहुत हो गया इंतज़ार,
कब तक रहेंगे किसी और के भरोसे,
कब तक बैठेंगे 
हाथ पर हाथ धरे,
अब ख़ुद ही बनना होगा सूरज,
ख़ुद ही पैदा करनी होगी ऊष्मा.

समय आ गया है 
कि कमर कस लें,
भिड़ जायँ इस सर्द सुबह से,
फिर हार हो या जीत,
जो हो, सो हो.

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

२९२. सोना बंद करो

फुटपाथ पर सोनेवालों,
तुम मकानों में क्यों नहीं सोते?
मकान नहीं, तो झुग्गियों में,
वह भी नहीं, तो पेड़ों पर,
पानी में, हवा में - कहीं भी.

फुटपाथ पर सोनेवालों,
तुम सोते ही क्यों हो?
जब सोने की जगह नहीं,
तुम होते ही क्यों हो?

क्या तुम नहीं जानते 
कि फुटपाथ पर सोना ख़तरनाक है,
कानूनन अपराध है?

नहीं सोना कानूनन अपराध नहीं है,
इसमें ख़तरा भी कम है,
इसलिए अपने भले के लिए 
फुटपाथ पर सोनेवालों,
सोना बंद करो.

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

२९१. नए साल से


नए साल,
मैंने पलकें बिछा दी हैं 
तुम्हारे स्वागत में,
तैयारी कर ली है जश्न की;
इंतज़ाम कर लिया है 
थोड़ी-सी आतिशबाजी,
थोड़े से संगीत का;
फैसला कर लिया है 
कि दिसंबर की सर्दी में
आधी रात तक जागकर
तुम्हारे आने का इंतज़ार करूंगा ;
ख़ुशी से चीखूंगा,
नाचूँगा, सीटियाँ बजाऊँगा,
जैसे ही तुम पहुँचोगे.

नए साल,
मान रखना मेरे स्वागत का,
टूटने न देना मेरी उम्मीदों को,
मेरे साथ रहना, मेरे बनकर,
गुज़र जाने देना मुझे ख़ुद में से,
जैसे पानी में से मछली.

कोई लम्बा कमिटमेंट नहीं,
बस तीन सौ पैंसठ दिन की बात है.

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

२९०. ज़िम्मेदारी

वह जो भी है,
उसका श्रेय या दोष 
उन्हें दो,
जिन्होंने उसे बनाया है. 

उसके माता-पिता,
उसका परिवार,
उसके गुरु,
उसके मित्र 
और वे अनगिनत लोग,
जो उससे जुड़े.

ईंट-ईंट जुड़कर 
सीमेंट-सरिया मिलकर 
इमारत बनती है.

अगर वह सिर उठाए 
बुलंद खड़ी रहे,
तो श्रेय इमारत को नहीं,
हर उस हाथ को है,
जिसने उसमें ईंट रखी,
सीमेंट-सरिया मिलाया.

और अगर इमारत 
भरभराकर गिर जाय,
तो तबाही की ज़िम्मेदारी 
वही लोग लें,
जिन्होंने उसे बनाया था.

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

२८९. राक्षस

कभी अपने अन्दर का 
राक्षस देखना हो,
तो उग्र भीड़ में 
शामिल हो जाना.

जब भीड़ से निकलो,
तो सोचना 
कि जिसने पत्थर फेंके थे,
आगजनी की थी,
तोड़-फोड़ की थी,
बेगुनाहों पर जुल्म किया था,
जिसमें न प्यार था, न ममता,
न इंसानियत थी, न करुणा,
जो बिना वज़ह 
पागलों-सी हरकतें कर रहा था,
वह कौन था?

उसे जान लो,
अच्छी तरह पहचान लो,
देखो, तुम्हें पता ही नहीं था 
कि वह तुम्हारे अन्दर ही 
कहीं छिपा बैठा है.